अमिदाकुजी (あみだくじ) की शुरुआत जापान के मध्यकालीन मुरोमाची काल (1336-1573) में हुई थी। सबसे पुराने लिखित सबूत आशिकागा शोगुन के दरबार के दस्तावेज़ों में मिलते हैं, जहाँ अधिकारी किसानों के बीच ज़मीन के टुकड़े बराबरी से बाँटने के लिए किरणों जैसी रेखाओं वाले चित्र बनाते थे। "अमिदाकुजी" नाम बुद्ध अमिदा (संस्कृत में अमिताभ) से आया है, जिनकी पूजा प्योर लैंड बौद्ध धर्म (जोदो-शू, होनेन द्वारा 1175 में स्थापित) में होती है। असल में खेल का मूल चित्र — एक केंद्र बिंदु से फैलती रेखाओं वाला — उजी के ब्योदो-इन मंदिर (1053 में राष्ट्रीय धरोहर घोषित) में अमिदा बुद्ध की सुनहरी मूर्तियों के पीछे चमकते प्रभामंडल (कोउहाई) जैसा दिखता था।
एदो काल (1603-1868) में यह खेल अपने आज के रूप में बदल गया — समानांतर खड़ी रेखाएँ जिन्हें आड़े पुलों से जोड़ा जाता है। ओसाका के व्यापारियों ने इसे नानिवा बाज़ारों में दुकानों की जगह तय करने के लिए अपनाया, और तेंपो सुइकोदेन (1829) में योशिवारा के मनोरंजन क्षेत्र में ग्राहकों की बारी तय करने के लिए इसके इस्तेमाल का ज़िक्र मिलता है। समुराई इसे शिष्टाचार के मामले बिना इज़्ज़त गँवाए सुलझाने के लिए करते थे — कन्फ्यूशियस के "वा" (सामंजस्य) सिद्धांत के मुताबिक। गणितज्ञ सेकी ताकाकाज़ू (1642-1708), जिन्हें "जापान का न्यूटन" कहा जाता है, ने अपनी किताब हात्सुबी सानपो (1674) में ऐसी ही आकृतियों के कॉम्बिनेटोरियल गुणों का अध्ययन किया था।
20वीं सदी में अमिदाकुजी जापान की शिक्षा व्यवस्था में खूब फैल गया। शिक्षा मंत्रालय (मोनबुकागाकुशो) ने 1920 के दशक से ही प्राइमरी स्कूलों में इसे निष्पक्षता और संयोग सिखाने के औज़ार के रूप में सुझाया। आज 95% से ज़्यादा जापानी बच्चे 10 साल की उम्र से पहले इस खेल को जानते हैं — 2018 के बेनेस्से सर्वे के मुताबिक। चौथी कक्षा की गणित की किताबें इसे क्रमचय (permutation) और प्रायिकता (probability) की बुनियादी समझ के लिए इस्तेमाल करती हैं। दिलचस्प बात यह है कि भारत में भी लॉटरी और चिट्ठी डालने की पुरानी परंपरा रही है — अमिदाकुजी उसी निष्पक्ष बँटवारे की भावना को एक अलग तरीके से पेश करता है।
गणित की ग्रुप थ्योरी में हर अमिदाकुजी चित्र सिमेट्रिक ग्रुप S_n की किसी permutation के adjacent transpositions में विभाजन को दर्शाता है। गणितज्ञ ताकेउची यासुओ ने 1994 में साबित किया कि n तत्वों की कोई भी permutation एक अमिदाकुजी से दिखाई जा सकती है, और मात्सुई तोमोमी ने 1995 में सिद्ध किया कि किसी permutation को बनाने के लिए ज़रूरी न्यूनतम पुलों की संख्या उसके inversions की संख्या के बराबर होती है। एरिक्सन और लिनुसन ने 1996 में Coxeter diagrams और सिमेट्रिक ग्रुप के reduced words से इसका संबंध स्थापित किया, जिससे अमिदाकुजी बीजगणितीय कॉम्बिनेटोरिक्स में अपने आप में एक शोध विषय बन गया।
सामाजिक मनोविज्ञान बताता है कि अमिदाकुजी सहमति बनाने का इतना कारगर तरीका क्यों है। थिबॉ और वॉकर (1975) के प्रक्रियागत न्याय पर शोध से पता चलता है कि लोग बुरे नतीजे को भी आसानी से मान लेते हैं जब प्रक्रिया उन्हें निष्पक्ष लगती है। जापान में, जहाँ मानवशास्त्री नाकाने चिए (जापानी समाज, 1967) के अनुसार "वा" (सामूहिक सामंजस्य) व्यक्तिगत पसंद से ऊपर माना जाता है, अमिदाकुजी फ़ैसले का ऐसा तरीका देता है जिसमें किसी की इज़्ज़त पर आँच नहीं आती। यामागिशी तोशियो (होक्काइदो विश्वविद्यालय) ने 2003 में दिखाया कि जापानी लोग डिजिटल गुमनाम ड्रॉ की बजाय ऐसे विज़ुअल और भागीदारी वाले तरीके पसंद करते हैं, क्योंकि प्रक्रिया की पारदर्शिता आपसी भरोसा मज़बूत करती है।
आज की जापानी संस्कृति में अमिदाकुजी हर जगह दिखता है। मांगा में गिंतामा (सोराची हिदेआकी, 2003) और डोरेमॉन (फ़ुजिको F. फ़ुजियो) में इस पर पूरे एपिसोड बने हैं। AKB48 जैसे ग्रुप्स के वैरायटी शो में इसे लाइव इस्तेमाल करके करोड़ों दर्शकों के सामने भूमिकाएँ और चैलेंज तय किए जाते हैं। दक्षिण कोरिया में इसका वेरिएंट "सदारी तागी" (사다리타기) उतना ही लोकप्रिय है — Running Man (SBS, 2010 से) ने इसे पूरे एशिया में मशहूर कर दिया। मोबाइल ऐप्स जैसे Amidakuji Maker (Google Play पर 2023 में 500,000 से ज़्यादा डाउनलोड) और LINE (230 मिलियन यूज़र्स) में बिल्ट-इन वर्शन ने इस परंपरा को नई पीढ़ी के लिए डिजिटल बना दिया है।